'मौन उन स्त्रियों की आवाज़ है, जिनकी कहानियाँ इतिहास ने देखीं, किंतु उनके भीतर की आवाज़ को सुनने की कोशिश कम ही की।
यह काव्य-संग्रह उन स्त्रियों के मन में उतरने का प्रयास है, जिन्हें हम सदियों से महाकाव्यों और कथाओं के पात्रों के रूप में जानते आए हैं- सीता, द्रौपदी, उर्मिला, मंदोदरी, कुंती, गांधारी, अंबा, हिडिंबा और अनेक अन्य।
उनके त्याग के पीछे छिपा आक्रोश, उनके धैर्य के पीछे दबा दर्द, उनके निर्णयों के पीछे छिपे प्रश्न और उनके मौन के भीतर दबी अनगिनत आवाज़ों को ये कविताएँ शब्द देती हैं।
मौन केवल चुप्पी नहीं है। यह वह भाषा है, जिसे तब चुना गया जब बोलने की अनुमति नहीं थी। यह वह प्रतिरोध है, जिसे इतिहास ने कमजोरी समझ लिया; वह पीड़ा है, जिसे समय ने अनदेखा कर दिया; और वह प्रश्न है, जिसका उत्तर सदियों से अधूरा है।
यह पुस्तक उनकी कहानियाँ बदलने का प्रयास नहीं करती, बल्कि उन कहानियों को उस दृष्टि से देखने का साहस करती है, जहाँ स्त्री केवल किसी की पत्नी, माँ, पुत्री या त्याग की प्रतिमूर्ति नहीं- बल्कि अपनी इच्छाओं, असहमतियों, सपनों, क्रोध और अस्तित्व वाली एक स्वतंत्र चेतना है।
क्योंकि हर कही हुई कथा के पीछे एक अनकही कथा होती है-
और कभी-कभी, सबसे गहरी आवाज़ वही होती है, जिसे हमने सदियों तक मौन समझ लिया।
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