'“रैना बीते ना” एक स्त्री के जीवन, संघर्ष, प्रेम और वर्षों से सँजोई गई खामोशियों की आत्मकथात्मक गाथा है। यह उस स्त्री की कहानी है, जिसने बेटी, बहन, पत्नी, बहू, माँ और दादी की भूमिकाएँ निभाते हुए सबका संसार सँवारा, पर अपने मन की आवाज़ को लंबे समय तक भीतर ही दबाए रखा।
बचपन की स्मृतियों, विदाई की पीड़ा, विवाह, मातृत्व, आर्थिक संघर्ष, बीमारी, रिश्तों की उलझनों, सामाजिक बंधनों और पारिवारिक जिम्मेदारियों से गुजरती यह पुस्तक एक भारतीय स्त्री के भीतर बसे उस संसार को सामने लाती है, जिसे अक्सर कोई देख नहीं पाता। रमा दुबे के वर्षों पुराने जीवन-लेखों, डायरी के पन्नों, कविताओं और अनकहे भावों से जन्मी यह पुस्तक केवल उनकी कहानी नहीं, बल्कि उन असंख्य स्त्रियों की आवाज़ है जो टूटती हैं, फिर उठती हैं और प्रेम करना कभी नहीं छोड़तीं।
यह न किसी से शिकायत है, न प्रतिशोध। यह जिए हुए जीवन का वह सच है, जिसमें प्रेम और पीड़ा, त्याग और उपेक्षा, अँधेरा और आशा साथ-साथ चलते हैं। कुछ रातें सचमुच बीतती नहीं। वे हमारे भीतर स्मृति, कविता और साहस बनकर जीवित रहती हैं।
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